Blog - 25 Jul 2026

सिखवाल समाज का इतिहास

सिखवाल समाज का इतिहास
सिखवाल समाज की पारंपरिक उत्पत्ति

सिखवाल समाज की परंपरागत मान्यता के अनुसार इसकी वंश परंपरा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मानसपुत्र महर्षि मरीचि से प्रारंभ होती है। महर्षि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप तथा उनके वंश में महर्षि विभाण्डक का जन्म हुआ। महर्षि विभाण्डक के पुत्र महर्षि श्रृंगी (ऋष्यश्रृंग) थे, जिन्हें सिखवाल समाज अपना आदि पुरुष मानता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि श्रृंगी का जन्म शापित देवकन्या मृगी (मृगपदा) के गर्भ से हुआ था। इसी कारण उनके नाम के साथ "श्रृंग" (सींग) शब्द जुड़ा। एक अन्य मत के अनुसार वे ज्ञान, तप और आदर्शों की सर्वोच्च ऊँचाई पर स्थित महान ऋषि थे, इसलिए उन्हें "श्रृंगी ऋषि" के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

अंगदेश में वर्षा यज्ञ

कथा के अनुसार एक समय अंगदेश में भीषण अकाल पड़ा। वर्षा के अभाव में जनता अत्यंत कष्ट में थी। तब देवर्षि नारद ने राजा रोमपाद को बताया कि कोसी नदी के तट पर महर्षि विभाण्डक के आश्रम में महर्षि श्रृंगी तपस्या कर रहे हैं। वे वैदिक कर्मकाण्ड तथा वर्षा यज्ञ के महान विद्वान हैं। यदि उनका सम्मानपूर्वक राज्य में आगमन कराया जाए और उनके द्वारा वर्षा यज्ञ सम्पन्न कराया जाए तो वर्षा अवश्य होगी।

राजा रोमपाद ने अनेक प्रयासों के बाद महर्षि श्रृंगी को अंगदेश लाने में सफलता प्राप्त की। मान्यता है कि उनके राज्य में प्रवेश करते ही वर्षा आरम्भ हो गई। तत्पश्चात महर्षि श्रृंगी ने वैदिक विधि से वर्षा यज्ञ सम्पन्न कराया, जिससे राज्य में पर्याप्त वर्षा हुई और अकाल समाप्त हो गया।

शांता का विवाह

महर्षि श्रृंगी के ज्ञान, तप और लोककल्याण से प्रसन्न होकर अंगदेश के राजा रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शांता का विवाह उनके साथ सम्पन्न कराया।

पौराणिक परंपरा के अनुसार शांता मूलतः अयोध्या के महाराज दशरथ और महारानी कौशल्या की पुत्री थीं। राजा रोमपाद संतानहीन थे, इसलिए महाराज दशरथ ने स्नेहवश शांता को उन्हें दत्तक रूप में प्रदान किया। तभी से शांता अंगदेश की राजकुमारी कहलायीं।

पुत्रकामेष्टि यज्ञ और भगवान श्रीराम का जन्म

समय बीतने पर अयोध्या के महाराज दशरथ भी पुत्रहीन होने के कारण अत्यंत चिंतित हुए। उन्होंने गुरु वशिष्ठ की सलाह पर महर्षि श्रृंगी को आमंत्रित किया और पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा।

महर्षि श्रृंगी ने वैदिक विधि से पुत्रकामेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया। यज्ञ की पूर्णाहुति पर अग्निकुण्ड से दिव्य खीर प्रकट हुई, जिसे उन्होंने महाराज दशरथ को उनकी तीनों रानियों—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—को वितरित करने के लिए दिया।

पौराणिक मान्यता के अनुसार उसी दिव्य प्रसाद के प्रभाव से महारानी कौशल्या के गर्भ से भगवान श्रीराम, कैकेयी के गर्भ से भरत तथा सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

सिखवाल समाज की वंश परंपरा

यज्ञ सम्पन्न होने के पश्चात महर्षि श्रृंगी पुनः अंगदेश लौट आए। परंपरा के अनुसार उनकी पत्नी शांता से एक पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका नाम सारंग (या सारंग्य ऋषि) था। महर्षि श्रृंगी ने उन्हें वेद एवं वेदान्त की शिक्षा प्रदान की, जिसके कारण वे सारंग्य ऋषि के नाम से विख्यात हुए।

सिखवाल समाज की मान्यता है कि सारंग्य ऋषि से ही श्रृंग वंश अर्थात सिखवाल ब्राह्मण समाज का विस्तार हुआ।

परंपरा के अनुसार सारंग्य ऋषि के सात पुत्र हुए—

ज्ञानेश्वर
धाराशीश
भीमेश्वर
गोविंददेव
दुग्धेश्वर
अनिलेश्वर
जयेश्वर

इन सातों ऋषियों के वंश से आगे चलकर चौबीस ऋषि हुए और उन्हीं से सिखवाल समाज के विभिन्न गोत्रों का विस्तार हुआ। समाज की विभिन्न परंपराओं में गोत्रों की संख्या 54, 57 अथवा अन्य रूपों में वर्णित मिलती है।

श्रृंगी ऋषि का धार्मिक महत्व

महर्षि श्रृंगी (ऋष्यश्रृंग) भारतीय पौराणिक परंपरा के अत्यंत प्रतिष्ठित ऋषियों में गिने जाते हैं। वे महर्षि विभाण्डक के पुत्र तथा महर्षि कश्यप के पौत्र थे। रामायण में उनका विशेष महत्व वर्णित है, क्योंकि उन्हीं के द्वारा सम्पन्न पुत्रकामेष्टि यज्ञ के फलस्वरूप भगवान श्रीराम सहित चारों राजकुमारों का जन्म हुआ।

इसी कारण सिखवाल समाज उन्हें अपना आदिपुरुष, प्रेरणास्रोत और गौरव का प्रतीक मानता है।

टिप्पणी: उपर्युक्त विवरण सिखवाल समाज की पारंपरिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। रामायण और पुराणों में वर्णित घटनाएँ धार्मिक आस्था का विषय हैं। गोत्रों की संख्या तथा वंशावली के संबंध में विभिन्न क्षेत्रों एवं परंपराओं में भिन्न-भिन्न मत मिलते हैं।
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